धरा झूम रही है
काव्य और कविताएं

धरा झूम रही है !

देखो धरा झूम रही है,

मतवाली सी गा रही है

नरतन करती गा रही है

देखो धरा झूम रही है।

 

खेत खलिहान सब नाच रहे हैं

वह किसान खुश रो रहा है

अबकी फसल होनी है बडिया

लाऊँगा  सोने की लडियाँ,

बेटी की विदाई है होनी,

अबकी फँसी नहीं लगानी,

देखो धरा झूम रही है।

 

वह अमीर रोता है ऐसे,

जैसे छोटा बालक जैसे,

काला धंधा कर पाऊगा कैसे

देखो धरा झूम रही है

 

सड़क किनारे रोता है भिखारी

पेट भरूँगा बालकों का कैसे

वह अमीर की बीबी रोती

कैसे जाऊँगी किटी और होटल

पानी भर रहा सड़कों पर

बदबू उसमें आती है जैसे

वह देखो धरा झूम रही है

 

अधिकारी सब मौज उड़ाते

जनता की कमाई पर हक जमाते

तोंद फूलाकर घूस है खाते,

देखो धरा झूम रही है,

देखो धरा झूम रही है।

 

नंदिता एंकाकी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *