सिर पर कपड़ा क्यों रखते है ?
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पूजा करते समय सिर पर कपड़ा क्यों रखते है?

मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा अथवा चर्च या कोई भी धार्मिक स्थल हो वहां पर सिर पर कपड़ा रख कर ही दर्शन या दबादत की जाती है। यज्ञ, हवन, पूजा, शुभ कार्यों में सिर पर रूमाल या अन्य वस्त्र रखते हैं। यहां तक की घर की स्त्रियाँ बड़े-बूढ़े बुजुर्ग, सास-ससुर से आशिर्वाद लेती है तो भी सिर पर साड़ी का पल्लू या चुन्नी ढक कर लेती हैं, ये उनके सम्मान का सूचक होता है, बड़ों को आदर देने के लिए भी सिर ढक कर रखा जाता हैं, कई-कई जगह पर तो स्त्रियाँ नियमित रूप से सिर को ढक कर ही रखती हैं।

आखिर क्या है इसका रहस्य? मनुष्य के शरीर में ‘सिर’ अंग बड़ा संवेदनशील है। हमारे शरीर में 72,000 सूक्ष्म नाडियां होती है इनमें तीन मुख्य नाडियां है, सुष्मना नाडी, पिंगला नाडी और इड़ा नाडी। सुष्मना नाड़ी, मध्य नाडी है, रीढ की हड्डी के मूल से लेकर सिर के ऊपर तक जाती है। पिंगला नाडी सुष्मना नाडी के दाएं से जाती है। इडा नाडी बाएं से जाती है, जैसे तीन पवित्र नदियाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम प्रयाग में होता है उसी प्रकार तीन नाडि़यां सुष्पना, पिंगला और इड़ा, इनका मूल संगम सिर के मूल में होता है, सिर के मूल में ब्रह्मारंध्र के ऊपर सूक्ष्म द्वार है जो एक हजार पंखुडि़यों का कमल है उसे ही सहस्रार चक्र कहते है। इसी चक्र से पूर्ण शरीर चलता है इसी में ही सम्पूर्ण शक्ति विराजमान होती है। इसी को आत्मा का स्थान, सूत्रत्मा कहा गया है, इसी से ईश्वरीय शक्ति ग्रहण की जाती है। ब्रह्मारंध्र, शरीर की सूक्ष्म ऊर्जाओं को ग्रहण करता है उसी ऊर्जा को पुनः ऊपर की ओर ले जाता है। ब्रह्माण्ड में अनगिनत ऊर्जा प्रति क्षण भ्रमण करती रहती हैं जब आप ध्यान अथवा उपासना करते हो तो शरीर एक स्थान पर स्थिर अचल हो जाता है, उस अचल अवस्था के दौरान ब्रह्माण्ड में मौजूद बहुत सारी ऊर्जा, हमारे शरीर में, सिर के माध्यम से प्रवेश करने लग जाती है। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तीव्रगामी और अत्यंत शक्तिशाली होती हैं, इन्हीं ऊर्जाओं से पृथ्वी के सभी तत्व चलायमान हैं। अगर किसी कुम्भ (घड़े) में अधिक ऊचाई से पानी डाला जाये तो वो कुम्भ टूट कर बिखर जाता है उसी प्रकार उपासना, ध्यान और पूजा के समय शरीर कुम्भ का रूप धारण कर लेता है जब कुम्भ रूपी शरीर में शक्तिशाली ऊर्जा सिर के ऊपर, ऊचाई से गिरेगी तब सिर पर भयंकर प्रहार होगा, जिससे शरीर में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ब्रह्माण्ड में शुद्ध ऊर्जाओं के साथ-साथ अशुद्ध ऊर्जाओं का भी साम्राज्य है, ये अशुद्ध ऊर्जा शरीर में प्रवेश न करें इसलिए सिर पर सूती वस्त्र, कपड़ा ढकते हैं, जैसे चाय देते समय उसको छाना जाता है ताकि साफ चाय पात्र में आ सके और अन्य साम्रगी छलनी में रह जाये इसी प्रकार सिर पर वस्त्र रखने से अशुद्ध ऊर्जा उस वस्त्र में अटक जाती हैं और शुद्ध ऊर्जा शरीर में प्रवेश कर जाती है। ध्यान, उपासना के समय ब्रह्मारंध्र के माध्यम से शरीर में ऊर्जा जाग्रत होने लग जाती है, ऊर्जाओं का प्रभाव शक्तिशाली होता है जिसके प्रभाव से सरदर्द, चक्कर आना, उल्टी आदि हो सकती है इन्हीं अशुद्ध ऊर्जाओं के प्रभाव को रोकने के लिए सिर पर कपड़ा अथवा शिखा रखी जाती हैं। सिर पर कपड़ा ढकने का अन्य कारण मन का इधर-उधर न भटकना भी है पूजा के समय सिर पर वस्त्र होने से आंखे इधर-उधर नहीं भटकती।

सिर के बालों में चुम्बकीय शक्ति होती है, जो ब्रह्माण्ड में चलित सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियों को आसानी से ग्रहण कर सकती है। ब्रह्मारंध्र सिर के मध्य स्थित होने से ब्रह्माण्ड में जब भी मौसम परिवर्तन होगा तो उसका प्रभाव ब्रह्मारंध्र से होते हुए शरीर के अन्य अंगों पर पड़ता है। स्त्रियां अपने सिर पर वस्त्र ढक कर रखती है जिसके कारण उनके सिर में नकारात्मक ऊर्जा ज्यादा प्रवेश नहीं करती इसके विपरित पुरूष का सिर खुला हुआ होता है जिससे नकारात्मक ऊर्जा उनके शरीर में प्रवेश करती रहती हैं, जिससे बालों के रोग गंजापन, डैंड्रफ, बाल झड़ना आदि पुरूषों में अधिक देखने को मिलते हैं, आपने स्वयं इसका प्रभाव देखा ही होगा कि पुरूष के सिर के बाल उड़ने लग जाते है वो गंजे होने लगते हैं जबकि उनके सिर के पीछे के हिस्से में अक्सर बाल होते हैं क्योंकि नकरात्मक ऊर्जा उनके सिर के मध्य भाग से, शरीर में प्रवेश करती है इसलिए सिर के ठीक ऊपर के बाल टूट जाते हैं और धीरे-धीरे गंजें होने लगते हैं। किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत उसके परिवार के सदस्यों का मुंडन किया जाता है ताकि मृत व्यक्ति की नकारात्मक ऊर्जा सदस्यों के बालों को ग्रहण न करें चुंकि स्त्रियां अपने सिर को ढक कर रखती हैं इसलिए वे नकारात्मक कीटाणु उनके बालों पर अपना अधिक प्रभाव नहीं दिखा पाते। नवजात बच्चे का भी मुंडन कराया जाता है ताकि गर्भ के दौरान उसके बालों में चिपके हुये अशुद्ध कीटाणु समाप्त हो जाये। सिक्ख धर्म अनुसार शरीर के 10 द्वार दो नासिका, दो आंख, दो कान, एक मुंह, दो गुप्तांग और सिर का मध्य भाग जिसको दशम द्वार कहा गया है। इन्हीं दसों द्वारों से प्रभु का साक्षात्कार होता है। कुंडली जागरण के लिए ये दसवां द्वार अत्यंत कठिन है, इस द्वार का सीधा संबंध मन से है, मन बहुत चंचल होता है पल में इधर, पल में उधर इसी मन को एकाग्र करने के लिए ध्यान आवश्यक है और ध्यान लगाते समय मन का भटकाव होता है इसी भटकाव को दूर करने के लिए सिर पर कपड़ा ढक कर रखा जाता है।

बच्चे के जन्म पर उसके दसवें द्वार का अनुभव किया जा सकता है। नवजात बच्चे के सिर पर हाथ रखकर उसके दसवें द्वार पर महसूस करों तो सिर का मध्य भाग फड़फड़ाता है। धीरे-धीरे जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसके सिर का मध्य भाग भी मजबूत होने लगता है इसमें कठोरता आ जाती है किन्तु इस पर अगर जोर से प्रहार किया जाये तो व्यक्ति के प्राण निकल जाते है। साधक, ऋषि-मुनी इसी दसवें द्वार के माध्यम से अपने प्राणों को शरीर से पृथक कर देते हैं। वो साधक होते हैं, वे ब्रह्मारंध्र पर शिखा, जटा रखते हैं ताकि ब्रह्माण्ड की ऊर्जाओं को आसानी से ग्रहण कर सके, किन्तु हम आम मनुष्य हैं हममें वो कला नहीं होती हमारा मन प्रति क्षण भटकता रहता है इसलिए शुभ कार्यों में मन एकाग्र करने के लिए सिर पर कपड़ा रखते है।

ज्योतिर्विद बॉक्सर देव गोस्वामी

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