रावण के विनाश का कारण ?
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रावण के विनाश का कारण ? – Reason of the Ravan Death ?

एक माँ अपनी बेटी से प्रश्न करती है कि बेटी तुझे कैसा भाई चाहिए? तो बेटी कहती है माँ वर्तमान को देखते हुए मुझे रावण जैसा भाई चाहिए, क्योंकि रावण ने अपनी बहिन के अपमान का बदला लेने के लिए अपना सब-कुछ न्यौछावर कर दिया था। रावण बहुत महान था, रावण ने अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी सीता हरण करने के बाद भी उसने माता सीता को हाथ तक नहीं लगाया था। स्वयं के और अपने परिवार की मुक्ति हेतु जान-बुझ कर माता सीता का हरण किया था ताकि श्रीराम के द्वारा उसका और उसके परिवार का वध हो जाए और समस्त राक्षसी जाति को मुक्ति मिल जाये। रावण महाप्रतापी, महाज्ञानी, प्रकांड-पंडित, चारों वेदों का ज्ञाता, शिव का महान भक्त, और ताण्डवस्तोत्र का रचयिता था।

लंकापति रावण से सभी परिचित है। रावण, सारस्वत ब्राह्मण पुलस्त्यऋषि का पौत्र और विश्रवा का पुत्र था। रावण की माता का नाम कैकसी था जो राक्षस कुल की थी। रावण के पिता ब्राह्मण और माता राक्षसी थी। इसमें कोई शंका नहीं है कि रावण शिव भक्त था, अति विशिष्ट राजनीतिज्ञ, महापराक्रमी योद्धा था। रावण को शास्त्रों का प्रचुर ज्ञान था प्रकांड विद्वान पंडित भी था रावण, किन्तु रावण महाज्ञानी नहीं था। शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता होने के बाद भी उसने अधर्म के कार्य ही किये। बात यह नहीं कि उसने केवल माता सीता का हरण ही किया था अपितु उसने हजारों ऋषियों मुनियों की तपस्या भंग कर उनके आश्रम जला दिये थे, जिस प्रकार धर्म की जड़ कटे, वे वही सब वेद विरूद्ध कार्य करता था, जिस-जिस स्थान में उसको गाय और ब्राह्मणों मिलते थे, उसी नगर, गाँव अथवा पुरवे में आग लगा दिया करता था जैसे इस चौपाई से मालूम चलता हैः-

जेहि बिधि होई धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।

जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आग्नि लगावहिं।।

अगर रावण विद्वान पंडित होता अथवा शास्त्रों का ज्ञाता होता तो क्या सभी देवता, ऋषि-मुनि, उससे भय खाते? नहीं। कदापि नहीं। एक सत्य और धार्मिक मनुष्य कभी भी जानबुझ कर किसी के हृदय को आघात नहीं पहुंचाता किन्तु रावण तो वेदों का ज्ञाता था फिर उसने ऐसे अधर्म कार्य क्यों किये? क्या सिर्फ भगवान श्रीरामचन्द्र से अपनी मुक्ति हेतु?

रावण एक अधर्मी और क्रूर राजा था जो सिर्फ अपना स्वार्थ देखता था। आज सभी लोग कहते हैं कि रावण ने माता सीता का हरण तो किया, किन्तु माता सीता को उसने हाथ तक नहीं लगाया ये रावण की मर्यादा थी ये सरासर गलत है अगर कुबेर के पुत्र ‘नलकुबेर’ द्वारा रावण को श्राप न दिया जाता ‘कि रावण यदि तूने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरूद्ध स्पर्श किया तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेगे।’ अपने सिर के टुकड़े ना हो इसी कारण उसने माता सीता को नहीं छुआ अन्यथा रावण बलात्कार जैसा घिनौना कार्य भी कर देता किन्तु रावण का वहां अधिकार नहीं चल रहा था इसलिए उसने माता सीता को तरह-तरह के प्रयोग कर डराया, धमकाया, अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण के कटे हुए सिर माता सीता को दिखाकर भय दिखाया, लालच दिया अर्थात् रावण ने सीताजी को बहुत प्रकार से समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखाया जैसा कि रामायण में आया है।

बहु विधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।

रावण के डर से कहीं भी शुभ कार्य नहीं होते थे, ब्राह्मण भोजन, श्राद्ध, यज्ञ, अनुष्ठान, कथा-किर्तन आदि नहीं होते थे। देवताओं का कोई महत्व नहीं था, गुरू और ब्राह्मण का आदर कोई नहीं करता था। न ही प्रभु की पूजा होती था, न यज्ञ, तप और न ही कोई नागरिकों को ज्ञान का पाठ पढ़ाता था। वेद, धर्मशास्त्र और पुराण की तो कोई कल्पना भी नहीं करता था। रावण और राक्षसों को हिंसा प्रिय थी।

बरनि न जाई अनीति घोर निसाचर जो करहिं।

हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।

राक्षस घोर अत्याचार करते थे, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। हिंसा पर ही उनकी प्रीति है, राक्षसों के पापों का कोई ठिकाना नहीं ।

जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।

आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालई खीसा।।

अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।

तेहि बहुबिधि त्रसइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।

अर्थात् जप, योग, वैराग्य, तप और यज्ञ में देवताओं के भाग पाने की बात रावण कहीं कानों से सुन पाता, तो उसी समय स्वयं उठ दौड़ता। कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था। संसार में ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानों में सुनने में नहीं आता था, जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरह से त्रस देता और देश से निकाल देता था।

इतना होने पर भी माता सीता रावण की बातों में नहीं आई और रावण की तरफ देखा भी नहीं किन्तु रावण को चैंन कहा था वो तो वासना में घिरा हुआ था किसी स्त्री के पतिव्रता धर्म को नष्ट करने की जैसे प्रतिज्ञा ही कर ली थी अगर रावण प्रकांड विद्वान होता तो क्या किसी स्त्री का हरण करता? नहीं। माता सीता ने जब उसके सभी प्रलोभनों को नहीं माना तो उसने कहा ‘सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।

‘मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढि़ कृपाना।।’ अर्थात् अगर महीने भर में यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा। भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीताहि त्रस देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद।।

स्वयं रावण की पत्नी मन्दोदरी रावण की मृत्यु पर विलाप करती हुई कहती है ‘अनेक यज्ञों को विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं हरण करने वाले! आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।’

रावण के भय से सभी देवता डरते थे यहां तक कि पृथ्वी भी उसके भय से कांप रही थी ‘अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।।’ भगवान शिव ने स्वयं कहा कि ‘हे भवानी! इस प्रकार धर्म के प्रति लोगों की अतिशय ग्लानि, अरूचि, अनास्था देखकर पृथ्वी भयभीत और व्याकुल हो गई। पृथ्वी ने कहा कि समुद्रों, नदियों और पर्वतों का बोझ भी मुझे इतना भारी नहीं लगता जितना भारी ये परद्रोही, दूसरों को प्रताडित करने वाला रावण लगता है।

जब सब ओर त्रही-त्रही हो रही थी और रावण के पाप से बचने के लिए पृथ्वी, देवता, ऋषि-मुनि सब नारायण की स्तुति कर रहे थे।

तब स्वयं नारायण को आकाशवाणी के रूप में कहना पड़ाः

जानि सभय सुर सुनि बचन समेत सनेह।

गगनगिरा गंभीर भई हरनि सोक संदेह।।

देवताओं और पृथ्वी को भयभीत जानकर और उनके स्नेहयुक्त वचन सुनकर शोक और संदेह को हरने वाली गंभीर आकाशवाणी हुई।

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।

अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा।।

हे मुनि, सिद्ध और देवताओं के स्वामियों! डरों मत। तुम्हारे लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और उदार सूर्यवंश में अंशों सहित मनुष्य का अवतार  लूँगा।

हरिहउँ सकल भूमि गरूआई। निर्भय होहु देव समुदाई।।

गगन ब्रह्मबानी सुनि काना। तुरन्त फिरे सुर हृदय जुडाना।।

मैं पृथ्वी का सब भार हर लूगा। हे देववृंद! तुम निर्भय हो जाओ। आकाश में ब्रह्म ‘भगवान’ की वाणी को कान से सनकर देवता तुरंत लौट गए, उनका हृदय शीतल हो गया।

रावण ने स्वर्ग लोक की अप्सरा ‘रम्भा’ को भी नहीं छोड़ा था, रावण गरीब ब्राह्मणी ‘वेदवती’ के सौंदर्य से प्रभावित होकर उसका स्त्रीतत्व भंग करने के लिए उसको बालों से घसीट ले जाने लगा था तो वेदवती ने आत्महत्या कर ली थी और रावण को श्राप दिया था कि ‘हे रावण, जा तेरे विनाश का कारण भी एक स्त्री होगी।’’ और रावण की ही प्रिय बहन सूर्पणखा जिसके पति का नाम विद्युतजिव्ह था, जो राजा कालकेय का सेनापति था। तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए जब रावण विजय प्राप्ति हेतु निकला तब उसका युद्ध कालकेय से हुआ जिसमें उसने अपने बहनाई विद्युतजिव्ह का भी वध कर दिया था तब सूर्पणखा ने अपने ही भाई रावण को श्राप दिया कि ‘हे रावण तेरे सर्वनाश का कारण मैं ही बनूँगी’ ।

ज्योतिर्विद् बॉक्सर देव गोस्वामी

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