संन्यास कब और क्यों लेना चाहिए ?
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संन्यास कब और क्यों लेना चाहिए ?

मनुष्य का जीवन बहुत विचित्र है, यहां कब क्या हो जाये किसी को कुछ नहीं मालूम। बचपन, मां की ममता और अध्ययन में व्यतीत होता है तो जवानी भोग-विलास, निद्रा, धन कमाने, गृहस्थी चलाने, पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों का निर्वाह करने में बीत जाती है। जबकि वृद्धावस्था में शरीर अस्वस्थ और परिवार की चिन्ता लगी रहती है।

मानव जीवन में 4 प्रकार के भाग अर्थात् आश्रम बताये गये है 1.  ब्रह्मचर्य, 2. गृहस्थ, 3. वानप्रस्थ और 4. संन्यास। आज वर्तमान में सब कुछ छोड़कर वन में नहीं जाया जा सकता क्योंकि वन अब रहे नहीं और समय बदल चुका है इसलिए मनुष्य को आत्म की शुद्धि और परमात्मा के मिलन हेतु अपने युवा काल में ही सन्यास धारण कर लेना चाहिए।

संन्यास का अर्थ यह नहीं है कि सब कुछ त्याग करके वन में चले जाये। संन्यास का अर्थ है सभी प्रकार के संकल्पों से मुक्ति। संन्यासी जो कुछ करता है उसमें लोकेषणा अर्थात् मान-सम्मान की कोई इच्छा नहीं होती, वित्तेषणा अर्थात् धन की कोई इच्छा नहीं, धन कमाने के लिए कोई गलत कार्य नहीं करता, किसी को किसी भी प्रकार से नहीं ठगता और पुत्रेष्णा अर्थात् पुत्र प्राप्ति की कोई इच्छा नहीं, मेरे बाद मेरे घर-जमीन, जायदाद, कारोबार, परिवार को कौन संभालेगा आदि-आदि ऐसी कोई इच्छा नहीं। जबकि वर्तमान युग में संन्यास का लोग गलत अर्थ निकालने लगे है जैसे कुछ लोग संन्यास लेने को निठल्लापन, गैरजिम्मेदार जीवन-यापन, पाखंड, निष्क्रियता, पयालन, परावलंबन आदि मानते हैं।

जबकि वास्तव में संन्यास मनुष्य के जीवन में तनावमुक्ति लाता है, मानसिक उद्विग्नता के ताप को शमन करने का साधन होता है, जीवन में निवृत्ति, निर्लिप्तता, अलगाव, अनाशक्ति, तटस्थता का भाव प्रकट करता है। संन्यास से सभी प्रकार के दुख सहन करने की शक्ति व्यक्ति में स्वतः प्रकट हो जाती है।

संन्यास लेने का उचित समय तभी है जब आप युवा काल में प्रवेश कर रहे हो या ज्ञान द्वारा आपका अंतकरण जाग जाये तभी संसार की प्रत्येक वस्तुओं के प्रति हेयता अर्थात् निरर्थकता की दृष्टि अपने अन्दर लाने का प्रयास करें तो आप संन्यस्त हो जाओगे और ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आश्रम में ही संन्यासी बनकर अपने कर्तव्यों का पालन करोगे तो वानप्रस्थाश्रम के पश्चात् अर्थात् 75 वर्ष के बाद आप संन्यास में दीक्षित हो जाओगे।

एक संन्यासी, परिवार का पालन-पोषण करते हुए मान-सम्मान, लाभ-हानि, स्त्री-पुरूष आदि के भेद से ऊपर उठ जाता है। यदि पति-पत्नी संन्यासी है तो वे एक दूसरे के प्रति आत्मदृष्टि रखते है। जीवन के क्षेत्र में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए संन्यासी का जीवन व्यतीत करना ही संन्यास धर्म है और संन्यास धर्म ही सभी वर्णाश्रमों का गुरू है।

ज्योतिर्विद बॉक्सर देव गोस्वामी

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